वो दिन-रातें सौग़ात लिए
वो गुज़रे पल कुछ साथ लिए
वो रौनकें, वो खामोशी
वो बात कही सरगोशी
वो इक दास्तां मुझमें
वो दीवारें
तस्वीरें, तस्वीरें
वो कमरों पे
तहरी रे, तहरी रे
ओ शीशो में जो कौन दिखते हैं
ओ छत, ओ ज़मीं में बसते हैं
वो किस्सों के आँगन में
ख़्वाब हैं कुछ खिले पूरे
मेरे
वो जो ढूँढे हम निशानियाँ
वो साँझी खुशी, तन्हाइयाँ
वो पल्कों पे मूँदे हँसी
वो खुद में ही रों दूँ अब कहीं
वो इक पहचान मुझमें
रौशन-से उजाले जो
सबको है संभाले जो
रिश्तों को यूँ पा ले जो
तुम ही हो ना, ख़ुदा?
ओ कहीं जाएँ हम, कहीं भी रहे
वो रिश्ते यूँ ही महकते रहे
वो इक करवा मुझमें
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