आग को तेरी राख से बुझाया
आज भी मैं जिस्म और तू मेरा साया
सर्द हाथों से दर तेरा खट खटाया
शाम भी ढली, बाहर तू ना आया
मुस्कुराता चला आंसू ना बाया
जानते हैं सब तुझको रास ना आया, रास ना आया
पत्थर जो बना, पूजने तो आए
आग जो बना, बस्तियां जलाईं
पानी बन के भी तुझ पे बरसना चाहा
वो फज्र की हवा हर घर रज़ा ले जाता
वो फज्र की हवा हर घर रज़ा ले जाता हो
रात को दिन किया
बिन तेरे बिन जिया
हाथ मेरे सिया गुनाह मैं ने किया
गम मैं हूं मुतला, गम जो तूने दिया
आग को तेरी राख से बुझाया
आज भी मैं जिस्म और तू मेरा साया
सर्द हाथों से दर दे राखट खटाया
शाम भी ढली, बाहर तू ना आया
हो
आग को तेरी राख से बुझाया
आज भी मैं जिस्म और तू मेरा साया
सर्द हाथों से दर दे राखट खटाया
शाम भी ढली, बाहर तू ना आया

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